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श्री गुरूवर चरण वंदन, श्री बंधुवर सादर नमन, जय श्री राम . नाइ चरन सिरु कह कर जोरी॥ नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी॥ अतिसय प्रबल देव तव माया॥ छूटइ राम करहु जौं दाया॥ . भावार्थ:-श्री रघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीव ने कहा- हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव! आपकी माया अत्यंत ही प्रबल है। आप जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छूटती है॥ जय श्री राम

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